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1
  • DREAD AND ANGUISH: AN AWAKENING OF SPIRIT


Dr. Uday Singh

Abstract: The feeling of dread and anguish has been around since the existence of human beings. Is there any resemblance between dread and anguish? There are explanatory challenges while viewing the phenomena of dread and anguish. Kierkegaard and Sartre tackle the concept of dread and anguish by focusing on the concept of sin and freedom. Kierkegaard argues that dread has no object. He gives his most original contribution by relating dread with sin. Sartre propounds his most original contribution on anguish by highlighting that anguish is the mode of being of freedom as consciousness of being.But this, too, is a bit unclear. It is not clear what exactly is meant by Sartre by mode of being of freedom. Similarly, it is a bit vague when Kierkegaard says that dread is sympathetic antipathy and an antipathetic sympathy. I shall examine and engage with these existential positions in an authentic philosophical voice


1-16
2
  • CRITIQUE OF ADVERTISING WORLD


1) Ragini Singh 2) Muskan Singh 3) Bhanvi Parashar 4) Jhanvi Dutta 5) Adeeb Umar 6) Kritika Singhal

Abstract: Literature, Activism, and Human Values have areflect a more just and equitable society. In this context, "Then and Now" refers to comparing the literature and activism of past eras to the present, exploring how they have evolved over time while addressing enduring human values. This topic offers an opportunity to delve into the ways literature and activism have influenced each other, shaping societal perceptions and driving positive transformations in our world. By examining the historical context and comparing it to the current state, we can better understand the role of literature, activism, and human values in shaping our society's past, present, and future. Ultimately, Literature, Activism, Human Values: Then and Now aims to spark conversations and reflections on the transformative power of literature, the importance of activism as a means to effect change, and the enduring significance of human values in shaping a just and inclusive society. It invites readers to appreciate the connections between literature, activism, and human values and to critically engage with the stories that shape our world


17-21
3
  • ज्ञानरंजन कृत‘फेंस के इधर और उधर’ कहानी- संग्रह में स्वतंत्रता के नैतिक आयाम


मंजु बाला डाॅ. रचना शर्मा

Abstract: अन्दरुनी तौर पर लोग वैसे ही दकियानूस हैं, स्वतंत्रताओं के हिमायती होने का ढोंग और सफल अमिनय करते हैं यानी वे महसूस तो करते हैं कि स्वतंत्र होकर, मुक्त व्यवहारों में जीना एक उपलब्धि है लेकिन उनके संस्कारों ने उन्हें इतनी गहराई से, जड़ों से बांध रखा है कि जीवन में जहां कहीं भी उस स्वतंत्रता के खतरों को झेलने, उठाने की बात आती है वह वे अपने उन्हीं आदर्शों में दुबक जाते हैं और उनके टूटने के डर से क्रोधित होते हैं, नैतिकता की दुहाई देने लगते हैं। कहानीकार भारतीय मानसिकता की ऐसी सीमाओं के खिलाफ खुले हुए रूप में कुछ नहीं कहता है बहुत ही तीखे ढंग से लेकिन इन सीमाओं को एक छिपे हुए व्यंग्य की नोक से कुरेद देता है।


22-25
4
  • दूधनाथ सिंह की कहानियों का वैशिष्ट्य


कांता देवी डाॅ0 रचना शर्मा

Abstract: दूधनाथ सिंह की कहानियां कथ्यों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। गांवों में पनपता पारस्परिक प्रेम, द्वेष, छुआछुत, नारी शिक्षा के लिए प्रेरित करती कहानियां लेखक की लेखनी का लोहा मनवाने में सक्षम है । कहानी के मुख्य पात्र प्रेम प्रसंग चित्रित नहीं किया गया है । इनकी कहानियों में यथासंभव भाई चारे की भावनाओं को दर्शाया गया है जो कि समय असमय एक दूसरे के प्रति सर्मपित है । क्योंकि गांव का परिदृश्य चित्रित किया गया है तो यह भी आवश्यक है कि गांव में विभिन्न जाति एवं सम्प्रदाय के लोग रहते हैं तो निश्चित रूप में उस आबादी का कुछ प्रतिशत तो मुस्लिम संप्रदाय का भी होगा और जहाँ भिन्न-भिन्न समुदाय के लोग निवास करते है तो वहाँ कुछ न कुछ जातिगत वैमनस्य भी होना लगभग निश्चित ही होगा। सांप्रदायिक दंगो की संभावनाएं भी दर्शायी गई है। हिन्दुओं की होली तथा समाजिक सांस्कृतिक, विवाह संस्कार के गीतों की झलक भी परिलक्षित होती है। कथ्य की दृष्टि से दूधनाथ सिंह की कहानियां अत्यंत उल्लेखनीय हैं। मनोभावों के प्रत्येक कोने को झांक कर लेखक ने देखा है।


26-28
5
  • जनसंख्या के विभिन्न पक्षों का समीक्षात्मक अध्ययन (हरियाणा के भिवानी जिले के संदर्भ में)


सुरेश कुमार डाॅ. राजू शर्मा

Abstract: देश को बढ़ती हुई जनसंख्या इस योग्य बना सकती है कि वह अपनी श्रम शक्ति के एक बड़े भाग को पूँजी निर्माण वाली परियोजनाओं में व्यस्त कर सके। श्रम अतिरेक अर्थव्यवस्थाओं में श्रमिकों का एक बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत होता है (अदृश्य बेरोजगारी)। इन लोगों को, कृषि उत्पादन को विपरीत रूप में प्रभावित किये बिना, सरलता से पूँजी निर्माण वाली परियोजनाओं की ओर स्थानान्तरित किया जा सकता है। इस प्रकार अतिरेक श्रम पूँजी निर्माण की दर को बढ़ाने में भारी योगदान कर सकता है। नर्कस के कथनानुसार- अतिरेक श्रम शक्ति का अर्थ है कम-से-कम किसी सीमा तक एक अदृश्य बचत सम्भाव्यता। अदृश्य बेरोजगारी के रूप में इन सम्भावित बचतों को किसी देश में पूँजी निर्माण के लिए गतिशील किया जा सकता है।\r\n


29-36
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